Monday, August 08, 2011

जीवन का उद्देश्य


जीवन का उद्देश्य

श्रील गोपाल कृष्ण गोस्वामी

अध्याय – १

शाश्वत आनंद

श्रीमद भागवतम – ५.५.१

व्याख्या

इस श्लोक में भगवान ऋषभदेव अपने पुत्रों को मनुष्य जीवन के महत्व के विषय में बताते हैं | ‘देह-भक्’ का अर्थ है देहधारी, परन्तु वे देहधारी जिन्हें मनुष्य देह प्राप्त हुई है उनके कर्म पशुओं से भिन्न होने चाहिए | शूकर तथा कूकर (सूअर व कुत्ता) जैसे पशु विष्ठा (मल) खाकर इन्द्रिय तृप्ति का आनंद अनुभव करते हैं | पूरे दिन के कड़े परिश्रम के पश्चात मनुष्य  रात्रि में भोजन, मद्यपान, मैथुन व निद्रा के द्वारा आनंद (सुख) प्राप्त करने का प्रयत्न करता है | साथ में ही उसे स्वयं की रक्षा भी करनी है | परन्तु यह मनुष्य सभ्यता नहीं है | मनुष्य जीवन का अर्थ है – आध्यात्मिक जीवन में उन्नति के लिए स्वेच्छा से भौतिक दुखों को ग्रहण करना | हालाँकि पशुओं और पेड़-पौधों के जीवन में भी, पूर्व जन्मों के पाप कार्यों के फलस्वरूप, दुःख है | परन्तु मनुष्यों को, दैवी जीवन के उच्च लक्ष्य के लिए, स्वेच्छा से त्याग और तपस्या के रूप में दुखों को ग्रहण करना चाहिए | दैवी जीवन की प्राप्ति के उपरांत ही मनुष्य शाश्वत आनंद का अनुभव कर सकता है | वास्तव में प्रत्येक जीवात्मा आनंद या सुख प्राप्त करने की ही कोशिश कर रहा है | परन्तु जब तक वह भौतिक शरीर में बद्ध है, उसे तरह – तरह के दुःख भोगने पड़ते हैं | मनुष्य योनि में एक उच्च योग्यता (बुद्धि) विद्यमान है | हमें शाश्वत आनंद प्राप्त करने के लिए उस उच्च सलाह के अनुसार कार्य करना चाहिए और वापस भगवद्धाम जाने के लिए प्रयासरत होना चाहिए |

इस श्लोक में यह महत्वपूर्ण है कि सरकार तथा प्राकृतिक संरक्षक, जैसे पिता , को अपने आश्रितों को कृष्णभावनामृत में उतरोतर प्रगति के लिए शिक्षित करना चाहिए | कृष्णभावनामृत से रहित जीवात्मा स्वभावतः जीवन-मरण के चक्र में दुःख भोगता है |  उसे इस चक्र से छुड़ाने और शाश्वत आनंदमय व सुखमय जीवन प्रदान करने के लिए भक्तियोग कि शिक्षा देनी चाहिए | एक मूढ़ सभ्यता लोगों को भक्तियोग के स्तर तक ले जाने वाली शिक्षा से वंचित रखती है | बिना कृष्णभावनामृत के मनुष्य शूकर व कूकर से अधिक नहीं है | ऋषभदेव की शिक्षाएं वर्तमान समय के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण हैं | लोगों को इन्द्रिय-भोग के लिए कठोर परिश्रम करने की शिक्षा व मार्गदर्शन दिया जा रहा है परन्तु जीवन का वास्तविक उद्देश्य स्पष्ट नहीं है | एक व्यक्ति जीविकार्जन के लिए प्रातः जल्दी घर से निकलता है, रेलगाड़ी पकड़ता है और एक भीड़ से भरे डब्बे में यात्रा करता है | उसे अपने व्यापारिक प्रतिष्ठान के पास पहुँचने के लिए एक या दो घंटे खड़े रहना पड़ता है | फिर कार्यालय तक पहुँचाने के लिए वो बस लेता है | कार्यालय पहुँच कर वो नौ से पांच तक कड़ा परिश्रम करता है | फिर अगले दो-तीन घंटों के बाद वो घर पहुंचता है | भोजनोपरान्त वो मैथुनरत होता है और फिर सो जाता है | इस पूरे दिन के कड़े परिश्रम के बाद वो उस थोड़े से मैथुन में कुछ सुख का अनुभव करता है | यन मैथुनादि गृहमेधी सुखं हि तुच्छम् (श्रीमद्भागवतम् ७.९.४५) ऋषभदेव स्पष्ट रूप से बताते हैं कि मनुष्य योनि इस तरह के जीवन यापन के लिए नहीं है जिसका आस्वादन शूकर तथा कूकर भी प्रतिदिन करते हैं | बल्कि शूकर तथा कूकर को मैथुन-सुख प्राप्त करने के लिए इतना कठोर परिश्रम करने की आवश्यकता भी नहीं रहती है | मनुष्य को कूकर तथा शूकर का अनुसरण नहीं करना चाहिए व उनसे भिन्न और बेहतर जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए | उस भिन्न जीवन का शास्त्रों में वर्णन है | मनुष्य जीवन व्रत व तपश्चर्या के लिए है | तपस्या के द्वारा मनुष्य भौतिक पाशों से छूट सकता है | जब कोई व्यक्ति कृष्णभावनामृत या भक्तिमय सेवा में रत रहता है तो उसका आनंद शाश्वत काल के लिए अवश्यम्भावी है | भक्तियोग या भक्तिमय सेवा के द्वारा चेतना शुद्ध हो जाती है | जीवात्मा अनेकानेक जन्मों से आनंद की खोज में है पर वो भक्तियोग का पालन करके अपनी समस्त समस्याओं का समाधान कर सकता है | और तब वो वापस अपने शाश्वत आवास, भगवद्धाम जाने की योग्यता प्राप्त कर लेता है | जैसे कि भगवद्गीता (४.९) में भी पुष्टि की गयी है :

जन्म कर्म च मे दिव्यं

एवं’ यो वेत्ति तत्वतः

त्यक्त्वा देहं ‘ पुनर्जन्म

नैति माम एति सो ‘र्जुन
“हे अर्जुन ! जो मेरे प्राकट्य और क्रियाकलापों की आध्यात्मिक प्रकृति को जानता है, वो देह-त्याग के उपरांत इस भौतिक जगत में पैदा नहीं होता वरन् मेरे शाश्वत आध्यात्मिक धाम को प्राप्त करता है | ”

1 Comments:

Blogger Nidhi said...

HARE KRISHNA

August 8, 2011 at 7:29 PM  

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