Wednesday, August 10, 2011

श्री रघुनन्दन ठाकुर


श्री रघुनन्दन ठाकुर



व्युहस तृतीयः प्रद्युम्न: प्रिय –नर्म-सखो’भवत

चक्रे लीला सह्यम यो राधा-माधवयोर व्रजे

श्री चैतान्याद्वैत तनु: स एव रघुनन्दन:

भगवान प्रद्युम्न, जोकि चतुर्व्यूह के तीसरे विस्तार हैं , राधा-माधव की व्रज लीला में कृष्ण के अंतरंग सखा के रूप में प्रकट होते हैं | वही भगवान प्रद्युम्न गौर-लीला में रघुनन्दन ठाकुर के रूप में प्रकट हुए हैं जोकि चैतन्य महाप्रभु और अद्वैताचार्य से अभिन्न हैं | (गौर-गणोदेश-दीपिका-७०)

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रघुनन्दन ठाकुर के पिता श्री मुकुंद दास

श्री मुकुंद दास , माधव दास और श्री नरहरि सरकार ठाकुर नाम के तीन भाई श्रीखंड नामक गाँव में निवास करते थे | श्री मुकुंद दास के पुत्र का नाम रघुनन्दन था | श्री मुकुंद दास राजवैध का कार्य कर रहे थे| (चैतन्य चरितामृत मध्य-लीला १५)

भक्त-गणे कहे, - शुन मुकुंदेर प्रेम

निगूढ़ निर्मल प्रेम, येन दग्ध हेम 

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सब भक्तों को बताया कि मुकुंद के कृष्णप्रेम के विषय में सुनो | यह बहुत गहरा और पिघले स्वर्ण की तरह शुद्ध निर्मल है |(चैतन्य चरितामृत मध्य-लीला १५.११९)

बाह्ये  राजवैद्य इंहो    करे राज-सेवा

अंतरे कृष्ण-प्रेम इंहार   जानिबेक केबा

मुकुंद दास बाह्य तौर पर राजवैध के रूप में सरकारी सेवा में हैं परन्तु उनका ह्रदय कृष्ण प्रेम से परिपूर्ण है | उनके प्रेम की कल्पना भी नहीं की जा सकती |(चैतन्य चरितामृत मध्य-लीला १५.१२०)



एक बार मुकुंद दास मुस्लिम राजा के समीप बैठे किसी चिकित्सा पद्धति पर चर्चा कर रहे थे कि कोई सेवक राजा की सेवा के लिए मोरपंख से बना पंखा ले आये | उसे देखते ही मुकुंद दास कृष्णप्रेम में भावमग्न हो गए और मूर्छित हो पृथ्वी पर गिर गए | जब राजा ने उनसे पूछा कि आपको कहीं दर्द तो नहीं है तो उन्होंने मिर्गी का बहाना बनाया | परन्तु राजा मुकुंद दास के ह्रदय में व्याप्त कृष्णप्रेम से परिचित था |



तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने मधुर शब्दों में मुकुंद दास से कहा कि तुम धर्मपूर्वक धनोपार्जन करो | रघुनन्दन की आसक्ति श्रीविग्रह अथवा श्री कृष्ण की सेवा में है अतः उसे वही करने दो | तब उन्होंने नरहरि ठाकुर को आज्ञा दी कि आप यहीं मेरे भक्तों के साथ रहें |



चैतन्य चरितामृत मध्य-लीला १५.११२-११७ में श्री चैतन्य महाप्रभु मुकुंद दास से पूछते है " मुकुंद, तुम पिता हो और रघुनन्दन तुम्हारा पुत्र है? या फिर रघुनन्दन तुम्हारा पिता है? मेरा संशय दूर करो|" इस पर मुकुंद दास ने कहा " हे महाप्रभु! रघुनन्दन मेरा पिता है ऐसा मेरा निश्चय है | क्योंकि हम सबको कृष्ण भक्ति प्रदान करने वाला रघुनन्दन ही है| " मुकुंद का उत्तर सुनकर महाप्रभु प्रसन्न हुए और कहा , " निस्संदेह | याहां हयिते कृष्ण-भक्ति सेई गुरु हय - जो हृदय में कृष्णप्रेम को जाग्रत करता है वही गुरु है "  

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रघुनन्दन ठाकुर की बाल्य-लीला

श्री मुकुंद दास के घर पर भगवान गोपीनाथ की विधि पूर्वक नित्य-सेवा हो रही थी | एक बार मुकुंद को किसी कार्यवश बाहर जाना पड़ा तब उन्होंने अपने पुत्र रघुनन्दन को श्रीविग्रह की अर्चना का कार्य सौंपा और कहा कि भगवान गोपीनाथ की ध्यानपूर्वक सेवा करे | उन्होंने समझाया कि गोपीनाथ जी के विग्रह हमारे परिवार में पीढ़ियों से सेवित हैं| जिस तरह तुम्हारी माता प्रतिदिन तुम्हे और मुझे भोजन कराती है उसी तरह गोपीनाथ जी को भी प्रतिदिन भोग अर्पण किया जाता है | इस तरह रघुनन्दन को समझा कर कि यह एक बहुत महत्त्वपूर्ण  जिम्मेवारी है और उन्हें बहुत ध्यानपूर्वक श्रीविग्रह की सेवा करनी है,  मुकुंद दास चले गए | अपने पिता की आज्ञा पाकर बालक रघुनन्दन ने श्री गोपीनाथ जी को अर्पित करने के लिए सम्पूर्ण सामग्री को एकत्र किया और श्रीविग्रह के कक्ष में चले गए |


रघुनन्दन उस समय केवल पांच वर्ष के बालक थे | और जब उन्होंने देखा कि गोपीनाथ जी ने कुछ भी नहीं खाया है जबकि उन्होंने तो बिलकुल अपने पिता की तरह ही भोग अर्पित किया था, तो वो बहुत व्याकुल हो गए| अंततः उन्होंने अश्रुपूर्ण नेत्रों से गोपीनाथ जी से प्रार्थना की ,"कृपया मेरा भोग स्वीकार करो और कुछ खा लो|" गोपीनाथ बालक रघुनन्दन की प्रेमपूर्वक सरल मनुहार में बंध गए और उन्होंने चुपके से बगैर कुछ झूठन छोड़े सारा अर्पित भोग ग्रहण कर लिया |



कुछ समय पश्चात रघुनंदन के पिता , मुकुंद दास , वापस आये और अपने पुत्र से पूछा कि क्या उसने अपना सारा कार्य अच्छे ढंग से किया है जैसे समझाया गया था? जब पुत्र ने कहा ,"हाँ", तब मुकुंद ने कहा मेरे लिए प्रसाद लाओ | रघुनंदन ने आश्चर्य से उत्तर दिया ," प्रसाद? मैंने तो सारा भोग अर्पित कर दिया था जैसे आपने मुझे बताया था और गोपीनाथ जी ने सारा भोग खा लिया | तो अब मैं आपके लिए क्या लाऊँ?" मुकुंद इस वाक्य से अवाक् रह गए | उन्होंने सोचा ," यह बालक नटखट नहीं है और सदैव सत्यभाषण ही करता है | मुझे नहीं लगता कि सब इसने स्वयं ही खा लिया हो | मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आखिर क्या हुआ होगा?"



इस विषय पर सोचते-सोचते उनकी जिज्ञासा इतनी बढ़ गयी कि उन्होंने फिर से एक दिन रघुनन्दन को भगवन गोपीनाथ को भोग अर्पण करने की प्रार्थना की और चले गए | हालाँकि इस दिन वो दूसरे रास्ते से वापस गए और एक जगह छुप कर देखने लगे कि क्या हो रहा है? उधर रघुनन्दन बहुत प्रसन्न थे कि उन्हें फिर से गोपीनाथ की सेवा का अवसर प्राप्त हुआ है | वो भोग की सारी सामग्री लेकर श्रीविग्रह कक्ष में गए और पहले की भांति भगवान से भोग ग्रहण करने की अनुनय-विनय करने लगे | जैसे ही गोपीनाथ ने आधा लड्डू खाया उन्होंने मुकुंद को झांकते हुए देख लिया | गोपीनाथ ने इस बात को छुपाने का प्रयास नहीं किया कि उन्होंने आधा लड्डू खा लिया है परन्तु उन्होंने फिर और लड्डू नहीं खाया | यह सब देखकर मुकुंद गोपीनाथ के दिव्य-प्रेम में भाव-विह्वल हो गए और उन्होंने अपने पुत्र को उठाकर अपनी गोद में बिठा लिया | और उत्साह पूर्वक, दिव्य-प्रेमवश कंपकंपाती वाणी से, उसके गुणों का गुणगान किया और उनकी आँखों से खुशी के आंसुओं का समुद्र उमड़ पड़ा | आज भी भाग्यशाली जन श्रीखंड में भगवान गोपीनाथ के हाथ में आधे खाए हुए लड्डू के दर्शन करने आते हैं | इस प्रकार उद्धव दास हर्षपूर्वक रघुनन्दन ठाकुर का यशोगान करते हैं जो मदन(कामदेव) से अभिन्न हैं |   

कृष्ण-लीला में वे कन्दर्प मंजरी हैं और द्वारका-लीला में वे भगवान कृष्ण के पुत्र कन्दर्प हैं | रघुनन्दन ठाकुर के पुत्र कनाई ठाकुर है और उनके वंशज आज भी श्रीखंड में निवास करते हैं | श्रीखंड जाने के लिए कटवा से बस अथवा रेलगाड़ी उपलब्ध हैं |

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अन्य महत्त्वपूर्ण लीलाएं

गौडीय वैष्णव अभिधान के अनुसार रघुनन्दन ठाकुर के जीवन में एक और विस्मयकारी दृष्टांत घटित हुआ: एक दिन अभिराम ठाकुर श्रीखंड आये और रघुनन्दन ठाकुर को दंडवत प्रणाम किया | रघुनन्दन ठाकुर ने उन्हें हृदय से लगा लिया और प्रेम-भाव में पिघलने लगे | रघुनंदन ठाकुर ने जोर-जोर से नाचना कीर्तन करना शुरू कर दिया| और ऐसा करते हुए उनके चरणों की एक नुपूर पांव से निकल गयी और चार मील दूर अकाई हाट में उनके शिष्य कृष्ण दास के घर के पास जाकर गिरी | बाद में इस घटना की स्मृति में उस स्थान पर एक तालाब बना दिया गया जिसे नुपूर कुंड कहते हैं |   

संकीर्तन यज्ञ के जनक , चैतन्य महाप्रभु ने रघुनन्दन ठाकुर को अधिकार दिया था कि वो संकीर्तन यज्ञ से पहले (अधिवास के दिन) भगवान को माल्यार्पण कर सकें और संकीर्तन यज्ञ की पूर्णाहुति अर्पित करें |



रघुनन्दन ठाकुर प्रतिवर्ष चातुर्मास्य पर बंगाली भक्तों को जगन्नाथपुरी धाम लेकर जाते थे और वो अपने चाचा नरहरि सरकार ठाकुर के साथ रथयात्रा उत्सव में श्रीखंडवासी भक्तों के समूह में नृत्य करते थे |



उन्होंने नरोत्तम दास ठाकुर द्वारा आयोजित खेतुडी उत्सव, कटवा में गदाधर दास के उत्सव और श्रीखंड में नरहरि सरकार के स्मृति उत्सव में भरपूर योगदान किया |



कुछ लोगों ने कहा, “जो भी व्यक्ति रघुनन्दन को प्रिय है वह जन्म-जन्मांतर महाप्रभु की कृपा प्राप्त करेगादूसरों ने कहा, “ रघुनन्दन इतने दयालु हैं कि वो सबसे नीच अधम व्यक्ति को भी अपने प्राणों से अधिक मान देते हैंकुछ बोले, “क्या विनम्रता है! कोई भी रघुनंदन ठाकुर के तुल्य नहीं हैऔर कुछ ने कहा, “ वो कामदेव के सामान सुन्दर हैं|” आदि आदि (भक्ति रत्नाकर .६६०)



रघुनन्दन ठाकुर ने अपने गौर-गोपाल विग्रह की सेवा विरासत में अपने पुत्र कनाई ठाकुर को सौंपी और श्रावण मास में शुक्ल-पक्ष की चतुर्थी को भौतिक जगत को त्याग दिया | कनाई ठाकुर ने अपने पिता के श्राध संस्कार के लिए विशाल भोज का आयोजन किया | रघुनन्दन ठाकुर श्री कृष्ण चैतन्य का नाम लेते लेते भौतिक दृष्टि से ओझल हो गए| कौन रघुनन्दन ठाकुर का यशोगान नहीं गाना चाहेगा? (भक्ति रत्नाकर १३.१८३-)


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